कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
Akanksha | Nandkishore Acharya
आकाँक्षा । नंदकिशोर आचार्य एक अतीत रक्त की भाँति प्रवाहित रहता है मुझमें एक भविष्य ने साँसों की तरह बाँध रखा है मुझे और मैं - घड़ी को सुई - भविष्य के अतीत में बदलने...
Tum Sudhi Ban Bankar Baar Baar | Bhagwati Charan Verma
तुम सुधि बन-बनकर बार-बार । भगवतीचरण वर्मा तुम सुधि बन-बनकर बार-बार क्यों कर जाती हो प्यार मुझे? फिर विस्मृति बन तन्मयता का दे जाती हो उपहार मुझे मैं करके पीड़ा को...