कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
Prem Samandar | Pallavi Vinod
प्रेम समंदर। पल्लवी विनोद प्रेम समंदर-सा ही है धरती पर इतना कि सब डूब जाए इतना कि प्यास ही ना बुझे इतना कि डूबकर भी उतराता रहे निकल बाहर फिर इसी में समाता रहे प्रेम ...
Bilbilaata Surya | Wazda Khan
बिलबिलाता सूर्य। वाज़दा खान डर और दबाव के घटाटोप अनधकार में बिलबिलाता सूर्य, कितना भीतर से जन्मा है सृष्टि के? भरी दुपहरी के आखिरी पलों में भी चढ़ नहीं पाया आकाश ...