कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
Lehron Ka Geet | Sumitranandan Pant
लहरों का गीत । सुमित्रानंदन पंत अपने ही सुख से चिर चंचल हम खिल खिल पडती हैं प्रतिपल, जीवन के फेनिल मोती को ले ले चल करतल में टलमल! छू छू मृदु मलयानिल रह रह करता प्रा...
Tabla | Vivek Nirala
तबला । विवेक निराला किसी की खाल है जो खींच कर मढ़ दी गई है मढ़ी हुई है मृतक की जीवन्त भाषा। मृतक के परिजनों का विलाप कस गया है इस खाल के साथ। वादक की फूँक से नहीं...