कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
Kal Raat | Nida Fazli
कल रात । निदा फ़ाज़ली कल रात वो थका हुआ चुप चुप उदास उदास सुनता रहा सड़क से गुज़रती बसों का शोर पीपल का पत्ता टूट के दीवार ढा गया आंतों का दर्द नींद की परियों को खा ...
Wo Zamana Guzar Gaya Kab Ka | Javed Akhtar
वो ज़माना गुज़र गया कब का । जावेद अख़्तर वो ज़माना गुज़र गया कब का था जो दीवाना मर गया कब का ढूँढता था जो इक नई दुनिया लूट के अपने घर गया कब का वो जो लाया था हम को द...