कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
Nakara | Jaun Elia
नाकारा । जौन एलिया कौन आया है कोई नहीं आया है पागल तेज़ हवा के झोंके से दरवाज़ा खुला है अच्छा यूँ है बेकारी में ज़ात के ज़ख़्मों की सोज़िश को और बढ़ाने तेज़-रवी की ...
Zafar | Arun Dev
ज़फ़र । अरुण देव उस कंधे पर अतीत का वैभव था अब वह एक बोझ था झुक गए थे कंधे विरासत की महानता भारी होती है ढहते सल्तनत के बेरंग तख़्त पर बैठ ज़फ़र लिखने लगा था कविता वह फ़क़ी...