Gh Ra | Arun Kumar Singh

घ र । अरुण कुमार सिंह 

घर की याद में
घर का स्पर्श है
शब्दशः घ र
बुदबुदाते हुए
शरीर का स्पर्श करता हूँ
रेखाएं खोजती रहती हैं
रास्ता घर का
रेखाएं अंधी हैं
घर नहीं दिखता
आजकल बहुत चलता हूँ
खड़ा रहता हूँ
दूर तक देखता हूँ 

सबके सामने कपड़ों के भीतर
नहीं टटोल पाता
कायर शब्द गले में मिलता है
उबकी आते ही किराए के कमरे में भागता हूँ
चुपके से ढूंढता हूँ 
र 
के बीच का हिस्सा

Nayi Dhara Radio