Hanso | Shraddha Upadhyay
हँसो। श्रद्धा उपाध्याय
कोई गिरे तो तुम उसे उठाते हुए गिरो फिर हँसो
तुम्हारी खिलखिलाहट से किसी खंडहर में उड़ जाएंगे चमगादड़
इतिहास में कई अवकाश हैं जिनमें सज जाएगी तुम्हारी हँसी
जिस सत्ता ने तुम्हें रोने नहीं दिया
उनको जीभ चढ़ा कर हँसो
दो जहाँ दस दिशाओं में हँसो
हँसो इतना कि बैठकों में रखे बुद्ध की तोंद पिरा जाए
उस चुप्पी के सामने हँसो जिसके द्वार तोरण पर लिखा था कि हँसी कड़ जाली
हँसो हे री जल्दी जल्दी बहुत सारा