Maskhari | Ashutosh Sharma

 मसखरी । आशुतोष शर्मा
 
गए रोज़ इक दोस्त को मिल गयी उसकी खोई हुई प्रेमिका
मुझे उसकी खोई हुई हंसी को पा जाने की थी ख़ुशी
लौट आने का सुख सबको नहीं मिलता,
हँसी मिल जाती है और भी कई बहानों से
प्रेमिकाओं के चले जाने का दुःख सबको नहीं मिलता
जिनको लगता है मैं हूँ एक हंसोल मसखरा
संवेदना का मज़ाक उड़ाता हुआ
उपेक्षा का एक भदेस चरवाहा
तो हाँ ,
किसी रोज़ खो गई थी मेरी भी प्रेमिका
और  हँसी भी
वो और बात है कि अकुताकर मैंने ही चुनी थी
प्रेम और हँसी के बीच...

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