Nirvaitikta - Ek Punarvichar | Satyam Tiwari

निर्वैयक्तिकता: एक पुनर्विचार | सत्यम तिवारी

हर ज़िम्मेदारी से भागने वाला
यही तर्क देता है

महानता का पैमाना नहीं
इसलिए निर्वैयक्तिकता को देखो

कथनी-करनी में अंतर की तरह
एक आदमी बायाँ हाथ देकर

दाहिने मुड़ जाता है
उसका इंडिकेटर ख़राब था कि मंशा

आत्मरक्षा में आए दिन होती हैं हत्याएँ
अनजाने एक पत्ता भी नहीं हिलता

जहाँ रात नहीं ढलती
जहाँ सूरज नहीं निकलता

बिना गए ही वहाँ जा रहे हो कवि?
ऐसा क्या पा लोगे

इस ख़राबे से अलग
उस ख़राबे में जुदा

ठोस भी होगा जो और उपयोगी भी
अपनी कल्पना के कक्ष से बाहर निकलो

देखो कल्पवृक्ष ग़ायब हो चुका है
देखोगे तो दिखेगा कि तुम्हारा व्रत टूट गया है

और दोषारोपण के लिए न असुर हैं न अप्सरा


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