Pahadi Aurat | Nirmala Putul

पहाड़ी औरत। निर्मला पुतुल 

वह जो सर पे सूखी लकड़ियों का गट्ठर लादे 
पहाड़ से उतर रही है 
पहाड़ी स्त्री 
अभी-अभी जाएगी बाज़ार 
और बेचकर सारी लकड़ियाँ 
बुझाएगी घर-भर के पेट की आग 

चादर में बच्चे को
पीठ पर लटकाये
धान रोपती पहाड़ी स्त्री
रोप रही है अपना पहाड़ सा दुख 
सुख की एक लहलहाती फसल के लिए 

पहाड़ तोड़ती, तोड़ रही है 
पहाड़ी बन्दिश और वर्जनाएं 

चटाईयाँ बुनते पहाड़ पर 
काट रही है पहाड़ सा दिन 

झाड़ू बनाती, बना रही है 
गंदगी से लड़ने के हथियार 
खोपा में खोसती फूल 
खोंस रही है किसी का दिल 
गाय-बकरियों के पीछे भागते 
उसके पाँव 
रच रहे हैं धरती पर 
सैकड़ों कुँवारे गीत। 


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