Ujda Mera Gaon | Rita Shukla

उजड़ा मेरा गाँव। ऋता शुक्ल

आम नीम महुआ की छाया
नंदन कानन गाँव हमारा
काशी मथुरा वृन्दावन 
गंगासागर से अधिक दुलारा 
चैता फगुआ ढोल झाल से 
मह मह करती थीं चौपालें 
कजरी सोहर बारहमासा
अंगनाई की गमक संभाले 
गंगा मईया की गोदी 
लहरों संग वह डोला पाँती
निर्गुण की लय साँझ उदासी
आजी करती दीया बाती
पहली पूजा काली मईया
खीर बताशा भोग लगाती
गाँव की उसकी रक्षा करना 
भोले बाबा से यह विनती
काम रसोई फिर जब जाती
घर-घर अगिल बिताई जाती
बालक बूढ़े सब होते पित
फिर आती गृहणी की बारी
पिछवाड़े की नीम दार से 
कोयल आती भद बतियाती 
और सुनहरी पाँखो वाली 
महुआ शुभ संदेशा लाती
हल बैलों की जोड़ी सजती
बद्री काका तड़के उठके 
भोर भई उठ जाग मुसाफ़िर
सुरती मलते हाथ लगाते 
रामू कर्मा धर्मा मिल कर 
गेंहूँ चना गवार उगाते 
अरहर सरसो मड़ुआ मकई 
फ़सल काटते परब मनाते 
हँसी ख़ुशी दिन पूरा होता 
साँझ रात को गले लगाती 
रामायण की बैठन खुलती 
ओसारे पर भीड़ उमड़ती
दरी बिछाओ रेहन लाओ 
धूप-दीप से पोथी पूजन 
तुलसी के दोहे चौपाई
राम कथा अनुपम मनभावन 
सिया राम मय सब जग जाने 
तान उठाते गिरिधर काका 
कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा। 
बारिद तपत तेल जनु बरिसा॥
जनक दुलारी के वियोग में 
वन-वन भटके श्री रघुनन्दन 
अम्मा की बिछोह में 
बाबू जी का वह बौराया सा मन 
गौरैया सा तिनका-तिनका 
आस जगाती छोटी बहिना 
बड़की दिदिया को संग लेकर 
कब लौटेंगे मेरे पहुना 
दीपू मुन्नू पढ़ने जाते 
रतनारी अंखियों में काजल 
कभी कुदीठ न लगने पाए
ये बालक ही माँओं का धन 
बेंत सूतते पंडित जी की 
आँख बचा कर दौड़ लगाते 
खेल कबड्डी कुश्ती जमती 
लोट-पोट हो जाती माटी
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