Vismriti | Sushma Kumari
विस्मृति। सुषमा कुमारी
हम दूसरी दुनिया के
चौथे, पाँचवे या सबसे निचले दर्जे के
बचे हुए मुट्ठी भर अनाज हैं,
आधे गेहूँ और आधे घून की तरह
बची हुई हमारी नियति
जातें में पीसने को तैयार है!
गेहूँ है, घून है
चक्की है, आटा है,
भूख अब भी बैठी है आँत में
हवा बदली है, मौसम बिगड़ा है।
अख़बारों में युद्ध अब सबसे बड़ा मुद्दा नहीं,
चूल्हे का सवाल
इन दिनों सबसे बड़ा सवाल है!
और चूहेदानी में फंसे
रोटी के टुकड़े सबसे बड़ा जाल है!
पत्थर से आग
और आग से चूल्हा जलाने वाले लोग
इन दिनों विस्मृति का शिकार हैं!